EWS आरक्षण से लेकर तीन तलाक तकः सीजेआई जस्टिस ललित ने सुनाए बड़े फैसले, कल हो रहे रिटायर

Edited By Updated: 08 Nov, 2022 06:01 PM

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प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति उदय उमेश ललित ने 74 दिन के अपने संक्षिप्त कार्यकाल के दौरान कई महत्वपूर्ण फैसले दिए और कार्यवाही के सीधे प्रसारण तथा मामलों को सूचीबद्ध करने की प्रक्रिया में बदलाव जैसे कदमों की शुरुआत की

नई दिल्लीः प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति उदय उमेश ललित ने 74 दिन के अपने संक्षिप्त कार्यकाल के दौरान कई महत्वपूर्ण फैसले दिए और कार्यवाही के सीधे प्रसारण तथा मामलों को सूचीबद्ध करने की प्रक्रिया में बदलाव जैसे कदमों की शुरुआत की। वह न्यायपालिका के ऐसे दूसरे प्रमुख रहे जिन्हें बार से सीधे उच्चतम न्यायालय की पीठ में पदोन्नत किया गया। नौ नवंबर, 1957 को जन्मे न्यायमूर्ति ललित को 13 अगस्त, 2014 को सुप्रीम कोर्ट का न्यायाधीश नियुक्त किया गया था और उन्होंने 27 अगस्त, 2022 को 49वें प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) के रूप में शपथ ली थी। आठ नवंबर उनके कार्यकाल का अंतिम दिन है।

न्यायमूर्ति ललित देश के दूसरे ऐसे प्रधान न्यायाधीश हैं, जो बार से सीधे सुप्रीम कोर्ट की पीठ में पदोन्नत हुए। उनसे पहले न्यायमूर्ति एस. एम. सीकरी मार्च 1964 में शीर्ष अदालत की पीठ में सीधे पदोन्नत होने वाले पहले वकील थे। वह जनवरी 1971 में 13वें सीजेआई बने थे। सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश 65 वर्ष की आयु में सेवानिवृत्त होते हैं।

EWS आरक्षण पर सुनाया बड़ा फैसला
प्रधान न्यायाधीश के कार्यकाल के अंतिम दिन उनके नेतृत्व वाली संविधान पीठ ने 3 : 2 के बहुमत से, सामान्य वर्ग के आर्थिक रूप से कमजोर तबके (ईडब्ल्यूएस) से संबंधित लोगों को दाखिलों और सरकारी नौकरियों में 10 प्रतिशत आरक्षण प्रदान करने वाले 103 वें संविधान संशोधन की वैधता को बरकरार रखा और कहा कि यह संविधान के मूल ढांचे का उल्लंघन नहीं करता है।

जस्टिस ललित ने न्यायमूर्ति एस रवींद्र भट के दृष्टिकोण से सहमति व्यक्त की, जिन्होंने सामान्य वर्ग के लिए ईडब्ल्यूएस कोटा को "असंवैधानिक" बताया। संवैधानिक महत्व के मामलों में महत्वपूर्ण कार्यवाही के सीधे प्रसारण या वेबकास्ट पर ऐतिहासिक फैसले की चौथी वर्षगांठ पर, न्यायमूर्ति ललित ने 27 सितंबर से संविधान पीठ के मामलों का सीधा प्रसारण शुरू करने का आदेश दिया।

प्रधान न्यायाधीश की अगुवाई वाली पीठ ने लश्कर-ए-तैयबा के आतंकवादी मोहम्मद आरिफ उर्फ ​​अशफाक को फांसी देने का मार्ग प्रशस्त किया और वर्ष 2000 में लालकिले पर हुए हमले के मामले में मौत की सजा देने के फैसले की समीक्षा करने की उसकी याचिका को खारिज कर दिया। इस हमले में सेना के तीन जवान शहीद हो गए थे। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीशों के चार रिक्त पदों को भरने का न्यायमूर्ति ललित का प्रयास अधूरा रह गया क्योंकि उनके उत्तराधिकारी न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति एस ए नज़ीर ने पांच सदस्यीय कॉलेजियम द्वारा नियुक्ति के लिए नामों की सिफारिश के प्रस्ताव पर लिखित सहमति मांगने की प्रक्रिया पर आपत्ति जताई।

अधूरी रह गई ये इच्छा
प्रधान न्यायाधीश के नेतृत्व वाले कॉलेजियम ने, हालांकि, विभिन्न उच्च न्यायालयों में लगभग 20 न्यायाधीशों के नामों की सिफारिश की और इसके अलावा बंबई उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता को शीर्ष अदालत के न्यायाधीश के रूप में नामित करने की सिफारिश भी की। इसने कुछ अन्य मुख्य न्यायाधीशों और न्यायाधीशों को स्थानांतरित करने के अलावा, कुछ उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों को मुख्य न्यायाधीश के रूप में पदोन्नत करने की भी सिफारिश की। शीर्ष अदालत में वर्तमान में 34 स्वीकृत पदों के विपरीत 28 न्यायाधीश हैं।

फैसलों के मोर्चे पर प्रधान न्यायाधीश की अगुवाई वाली पीठ ने 2002 के गुजरात दंगों के मामलों में "निर्दोष लोगों" को फंसाने के लिए कथित सबूत गढ़ने के आरोप में गिरफ्तार कार्यकर्ता तीस्ता सीतलवाड़ के साथ ही केरल के पत्रकार सिद्दीकी कप्पन को भी जमानत दे दी जिन्हें अक्टूबर 2020 में तब गिरफ्तार किया गया था जब वह कथित तौर पर सामूहिक बलात्कार के बाद एक दलित महिला की मौत की घटना के चलते उत्तर प्रदेश के हाथरस जा रहे थे।

जस्टिस ललित के नेतृत्व वाली पीठ ने मौत की सजा के प्रावधान वाले मामलों में दिशा-निर्देश जारी करने की मांग वाली याचिका को पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ को भेज दिया जिसे यह तय करना है कि मौत की सजा के प्रावधान वाले मामलों में अपराध की गंभीरता कम करने वाली संभावित परिस्थितियों पर कब और कैसे विचार किए जा सकता है? उनके नेतृत्व वाली पीठों ने शीर्ष अदालत के आदेशों का पालन न करने पर बहुत कड़ा संज्ञान लिया और भगोड़े व्यवसायी विजय माल्या को चार महीने कैद की सजा सुनाई, जो 9,000 करोड़ रुपये से अधिक के बैंक ऋण डिफाल्ट मामले में आरोपी है।

इसने फोर्टिस हेल्थकेयर लिमिटेड के पूर्व प्रवर्तकों-मलविंदर सिंह और शिविंदर सिंह को मध्यस्थता निर्णय का सम्मान करने के लिए 1170.95 करोड़ रुपये का भुगतान करने का वास्तविक प्रयास न करने पर अवमानना दोषी ठहराया और उन्हें छह महीने की जेल की सजा सुनाई। न्यायमूर्ति ललित की अगुवाई वाली पीठ ने भारतीय मूल के एक केन्याई नागरिक को उसकी अलग हुई पत्नी से बेटे का संरक्षण हासिल करने में "धोखाधड़ी" कर दीवानी और आपराधिक अवमानना ​​करने के मामले में एक साल की जेल की सजा सुनाई और उस पर 25 लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया।

जस्टिस ललित ने न्यायपालिका के प्रमुख के रूप में अपने 74 दिन के कार्यकाल के दौरान मामलों को सूचीबद्ध करने और सुप्रीम कोर्ट में अत्यावश्यक मामलों का उल्लेख करने सहित तीन प्रमुख क्षेत्रों पर काम किया। न्यायमूर्ति ललित को 13 अगस्त, 2014 को सुप्रीम कोर्ट का न्यायाधीश नियुक्त किया गया था। तब वह वरिष्ठ अधिवक्ता थे। वह मुसलमानों में ‘तीन तलाक' की प्रथा को अवैध ठहराने समेत कई ऐतिहासिक फैसलों का हिस्सा रहे।

तीन तलाक पर दिए फैसले की पीठ में रहे शामिल
पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने अगस्त 2017 में 3 : 2 के बहुमत से ‘तीन तलाक' को असंवैधानिक घोषित कर दिया था। इन तीन न्यायाधीशों में न्यायमूर्ति ललित भी थे। उन्होंने राजनीतिक रूप से संवेदनशील अयोध्या में राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद भूमि विवाद मामले में सुनवाई से खुद को जनवरी 2019 में अलग कर लिया था।

मामले में एक मुस्लिम पक्षकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता राजीव धवन ने संविधान पीठ को बताया था कि न्यायमूर्ति ललित उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह के वकील के रूप में एक संबंधित मामले में वर्ष 1997 में पेश हुए थे। न्यायमूर्ति ललित की अगुवाई वाली पीठ ने एक अन्य महत्वपूर्ण फैसले में कहा था कि त्रावणकोर के पूर्व राजपरिवार के पास केरल में ऐतिहासिक श्री पद्मनाभस्वामी मंदिर के प्रबंधन का अधिकार है। उनकी अध्यक्षता वाली पीठ ने यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (पॉक्सो) कानून के तहत एक मामले में बंबई उच्च न्यायालय के ‘‘त्वचा से त्वचा के संपर्क'' संबंधी विवादित फैसले को खारिज कर दिया था।

शीर्ष अदालत ने कहा था कि यौन हमले का सबसे महत्वपूर्ण घटक यौन मंशा है, त्वचा से त्वचा का संपर्क नहीं। न्यायमूर्ति ललित जून, 1983 में वकील बने और उन्होंने दिसंबर 1985 तक बंबई उच्च न्यायालय में वकालत की। वह जनवरी 1986 में दिल्ली आकर वकालत करने लगे और अप्रैल 2004 में उन्हें शीर्ष अदालत द्वारा वरिष्ठ अधिवक्ता नामित किया गया। उन्हें 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन मामले में सुनवाई के लिए केन्द्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) का विशेष लोक अभियोजक नियुक्त किया गया था।

 

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