Edited By Anu Malhotra,Updated: 31 Jan, 2026 01:22 PM

हवाई सफर के दौरान जब अचानक प्लेन हिचकोले खाने लगता है, तो अच्छे-अच्छों की धड़कनें बढ़ जाती हैं। कई बार तो ऐसा लगता है जैसे आसमान में कोई अदृश्य गड्ढा आ गया हो या जहाज किसी चीज से टकरा गया हो। लेकिन क्या वाकई बादलों के बीच कोई ऐसी दीवार होती है जिससे...
नेशनल डेस्क: हवाई सफर के दौरान जब अचानक प्लेन हिचकोले खाने लगता है, तो अच्छे-अच्छों की धड़कनें बढ़ जाती हैं। कई बार तो ऐसा लगता है जैसे आसमान में कोई अदृश्य गड्ढा आ गया हो या जहाज किसी चीज से टकरा गया हो। लेकिन क्या वाकई बादलों के बीच कोई ऐसी दीवार होती है जिससे प्लेन टकराता है? जवाब है—बिल्कुल नहीं। चलिए, इस रोमांचक और थोड़े डरावने लगने वाले 'टर्बुलेंस' के पीछे का विज्ञान समझते हैं।
हवाई जहाज के इस तरह हिलने-डुलने को हम आसान भाषा में हवा की अस्थिरता कह सकते हैं। कल्पना कीजिए कि एक नाव शांत समंदर में चल रही है और अचानक लहरें तेज हो जाएं, तो नाव उछलने लगती है। ठीक वैसे ही, आसमान में भी हवा की अदृश्य लहरें होती हैं। जब प्लेन के पंखों के आसपास बहने वाली हवा का तालमेल बिगड़ता है, तो हमें झटके महसूस होते हैं।
इसके पीछे कई दिलचस्प कारण हैं। सबसे पहले आता है खराब मौसम। जब आसमान में काले घने बादल (क्यूम्युलोनिम्बस) होते हैं, तो उनके भीतर हवा बहुत तेजी से ऊपर-नीचे की तरफ भागती है। यह हवा प्लेन को कभी ऊपर की ओर धक्का देती है तो कभी नीचे, जिससे सफर थोड़ा ऊबड़-खाबड़ हो जाता है।
एक और वजह है 'जेट स्ट्रीम', जिन्हें आप आसमान में बहने वाली हवा की तेज नदियां कह सकते हैं। जब विमान तेज हवा के इस घेरे में आता या निकलता है, तो रफ्तार के अंतर की वजह से झटके लगना लाजमी है। इसके अलावा, अगर प्लेन किसी बड़े पहाड़ के ऊपर से गुजर रहा हो, तो पहाड़ों से टकराकर ऊपर उठने वाली हवा भी विमान का रास्ता थोड़ा कठिन बना देती है।
सबसे जरूरी बात यह है कि ये झटके किसी टक्कर की वजह से नहीं होते। आसमान में कोई ठोस चीज नहीं होती जिससे प्लेन टकराए। आधुनिक विमान इतने मजबूत बनाए जाते हैं कि वे भयंकर से भयंकर हवा के दबाव को आसानी से झेल सकें। साथ ही, पायलटों को इन परिस्थितियों से निपटने की खास ट्रेनिंग दी जाती है। इसलिए अगली बार जब प्लेन थोड़ा हिले, तो घबराएं नहीं, बस अपनी सीट बेल्ट बांधें और याद रखें कि यह सिर्फ हवा का एक खेल है।