पूर्णिमा श्राद्ध कल- मुहूर्त के साथ जानें पितरों को प्रसन्न करने की विधि

Edited By Updated: 04 Sep, 2017 07:44 AM

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भारतीय संस्कृति व सनातन धर्म में पितृ ऋण से मुक्त होने के लिए अपने माता-पिता व परिवार के मृतकों के निमित श्राद्ध करने की अनिवार्यता प्रतिपादित की गई है। श्राद्ध कर्म को पितृकर्म भी कहा गया है व पितृकर्म से तात्पर्य पितृ पूजा भी है।

भारतीय संस्कृति व सनातन धर्म में पितृ ऋण से मुक्त होने के लिए अपने माता-पिता व परिवार के मृतकों के निमित श्राद्ध करने की अनिवार्यता प्रतिपादित की गई है। श्राद्ध कर्म को पितृकर्म भी कहा गया है व पितृकर्म से तात्पर्य पितृ पूजा भी है। शास्त्रानुसार पितृ अत्यंत दयालु तथा कृपालु होते हैं, वह अपने पुत्र-पौत्रों से पिण्डदान व तर्पण की आकांक्षा रखते हैं। श्राद्ध तर्पण से पितृ को बहुत प्रसन्नता एवं संतुष्टि मिलती है। पितृगण प्रसन्न होकर दीर्घ आयु, संतान सुख, धन-धान्य, विद्या, राजसुख, यश-कीर्ति, पुष्टि, शक्ति, स्वर्ग एवं मोक्ष तक प्रदान करते हैं। 


हर वर्ष भाद्रपद पूर्णिमा तिथि से आश्विन अमावस्या तिथि तक 16 दिन श्राद्धकर्म किए जाते हैं। वर्ष 2017 में श्राद्धपक्ष का प्रारंभ मंगलवार दि॰ 05.09.17 को पूर्णिमा श्राद्ध से हो रहा है। दि॰ 05.09.17 को दिन में 12:41 से पूर्णिमा प्रारंभ होगी। शास्त्रों में श्राद्ध को दोपहर में करने का विधान है व इसके लिए तीन मुहूर्त बताए गए हैं। पहला कुतुप महूर्त, दूसरा रौहिण महूर्त व तीसरा अपराह्न काल। अतः पूर्णिमा का श्राद्ध कुतुप मुहूर्त दिन 11:54 से दिन 12:44 तक रहेगा। रौहिण मुहूर्त दिन 12:44 से दिन 13:34 तक रहेगा तथा अपराह्न काल दिन 13:34 से शाम 16:04 तक रहेगा। शास्त्रों ने कुतुप को सर्वोत्तम, रौहिण को श्रेष्ठ व अपराह्न को साध्य बताया है।


पूर्णिमा श्राद्ध विधि: गाय के दूध में पकाए हुए चावल में शक्कर, इलायची, केसर व शहद मिलाकर खीर बनाएं। गाय के गोबर के कंडे को जलाकर पूर्ण प्रज्वलित करें। प्रज्वलित कंडे को किसी बर्तन में रखकर दक्षिणमुखी होकर खीर से तीन आहुति दें। सर्वप्रथम गाय, काले कुत्ते व कौए हेतु ग्रास अलग से निकालकर उन्हे खिलाएं, इनको ग्रास डालते हुए याद रखें कि आप का मुख दक्षिण दिशा की तरफ ही साथ ही जनेऊ (यज्ञोपवित) सव्य (बाई तरह यानि दाहिने कंधे से लेकर बाई तरफ होना चाहिए।। इसके पश्चात ब्राह्मण को भोजन कराएंं फिर स्वयं भोजन ग्रहण करें। पश्चात ब्राह्मणों को यथायोग्य दक्षिणा दें।


आचार्य कमल नंदलाल
ईमेल: kamal.nandlal@gmail.com

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