Edited By Niyati Bhandari,Updated: 27 Sep, 2023 10:31 AM

एक बार सम्राट विक्रमादित्य अपने सेनापति और मंत्री के साथ रथ पर सवार होकर कहीं जा रहे थे। मार्ग में उन्होंने देखा कि सड़क पर धान के दाने बिखरे पड़े हैं। उन्होंने अपने सारथी से कहा, ‘‘सारथी,
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एक बार सम्राट विक्रमादित्य अपने सेनापति और मंत्री के साथ रथ पर सवार होकर कहीं जा रहे थे। मार्ग में उन्होंने देखा कि सड़क पर धान के दाने बिखरे पड़े हैं। उन्होंने अपने सारथी से कहा, ‘‘सारथी, रथ रोको। यहां भूमि हीरों से पटी पड़ी है। जरा मुझे हीरे उठाने दो।’’

उनके मंत्री ने भूमि की ओर देखा और बोले, ‘‘महाराज, संभवतया आपको भ्रम हुआ है। भूमि पर हीरे नहीं, धान के दाने पड़े हुए हैं।’’
सम्राट विक्रमादित्य तुरंत रथ से नीचे उतरे और धान के दानों को बटोर कर अपने माथे पर लगाया। ऐसा करके उन्होंने अपने मंत्री की ओर देखा और बोले, ‘‘मंत्री जी, आपने पहचानने में भूल की है। असली हीरा तो अन्न ही होता है। अन्न से ही सबका पेट भरता है। इसीलिए अन्न को हमारे ऋषि-मुनियों ने श्रद्धापूर्वक अन्नदेव कहकर सदैव उसका सम्मान करने की प्रेरणा दी है। अत: अन्न के प्रत्येक दाने का आदर करना चाहिए। अन्न का यह दाना किसी हीरे से कम कैसे हो सकता है?’’

सम्राट विक्रमादित्य के ऐसा कहने पर अचानक उनके मंत्री को अहसास हुआ कि जैसे साक्षात अन्नपूर्णा वहां खड़ी होकर सम्राट विक्रमादित्य को आशीर्वाद दे रही हों कि जिस राज्य का राजा अन्न के प्रत्येक दाने का इतना सम्मान करता हो उस पर उनका सदैव आशीर्वाद रहेगा और वह राज्य सदैव अन्न के अक्षय भंडार से परिपूर्ण रहेगा।
