​​​​​​​Jayanti Special: ‘महाराजा अग्रसेन’ ने दिया आत्मनिर्भरता का मंत्र

Edited By Niyati Bhandari,Updated: 26 Sep, 2022 11:43 AM

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भले ही महाराजा अग्रसेन वैश्य समाज के संस्थापक एवं उन्नायक हों, लेकिन उनके जीवन तथा व्यवहार-दर्शन में हर समाज के लिए सफलता का मूलमंत्र छिपा है। वह समतामूलक समाज के

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भले ही महाराजा अग्रसेन वैश्य समाज के संस्थापक एवं उन्नायक हों, लेकिन उनके जीवन तथा व्यवहार-दर्शन में हर समाज के लिए सफलता का मूलमंत्र छिपा है। वह समतामूलक समाज के संस्थापक हैं। उन्होंने समाज के सहयोग से आर्थिक समृद्धि का मंत्र दिया। महाराजा अग्रसेन का ‘एक ईंट, एक रुपए’ का मंत्र न केवल वास्तविक समाजवाद का पर्याय था बल्कि आर्थिक समृद्धि की राह खोलता था। उनका आग्रह था कि समाज का जो भी व्यक्ति गरीब है, उसे एक ईंट व एक रुपया दिया जाए। सब लोग मिलकर जहां उसके रोजगार की व्यवस्था करते थे, वहीं एक-एक ईंट जोड़कर उसका घर बन जाता था। इस तरह वह व्यक्ति आत्मनिर्भर बन जाता था। वह सफल होने पर समाज का ऋण चुकाता। दरअसल, उनकी सोच थी कि शासक से मिलने वाली किसी भी तरह की मदद व्यक्ति को काहिल बना सकती है।

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पूरे देश में प्राचीन काल से बनी सामुदायिक शिक्षण संस्थाएं, जल स्रोत, सराय व वन संपदा का संवर्धन महाराजा अग्रसेन की इसी सोच का परिणाम था। महाराजा अग्रसेन सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध लड़े। उन्होंने बलि प्रथा का विरोध किया। मासांहार व मदिरापान को समाज के पतन का मुख्य कारण बताया। अहिंसा के पुजारी, शान्तिदूत महाराजा अग्रसेन का जन्म प्रतापनगर के राजा वल्लभ के गृह में लगभग 5100 वर्ष पूर्व हुआ। महालक्ष्मी के आशीर्वाद का कवच पाकर महाराजा अग्रसेन ने पूरे भारत को जानने के लिए यात्रा की और अपना राज्य स्थापित करने का निश्चय किया। 

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उन्होंने अग्रोहा को अपनी राजधानी बनाया। व्यापार, कृषि व उद्योग की समृद्धि से अग्रोहा व महाराजा अग्रसेन की कीॢत चारों तरफ फैलने लगी।  आज अग्रवाल समाज का प्रभुत्व उद्योग एवं व्यापार के साथ-साथ प्रशासन, न्याय, राजनीति, साहित्य व शिक्षा के क्षेत्र में भी दिखाई देता है। व्यावहारिक जीवन में महाराजा अग्रसेन जी ने जीवन में कर्म को प्रधानता दी। उनका विश्वास था कि निर्माण द्वारा ही हम रोजगार के साधन पैदा कर सकते हैं व रोजगार ही देश की समृद्धि का कारण होता है। उनका आह्वान था कि हमें किसी की दया का पात्र नहीं बनना चाहिए। महाराजा अग्रसेन जी के आदर्शों का पालन करते हुए अग्रबंधुओं ने देश में हजारों स्कूलों, कालेजों, धर्मशालाओं, अस्पतालों, मन्दिरों, गौशालाओं, अनाथालयों, तालाबों व कुओं का निर्माण करवाया। देश की हजारों योजनाओं में अग्रबन्धुओं का सक्रिय योगदान है। देश के निजी क्षेत्र के लगभग 33 प्रतिशत उत्पादन व सेवाओं का श्रेय अग्रबन्धुओं को जाता है, जो टैक्स का सर्वाधिक योगदान राष्ट्रीय खजाने में देते हैं।

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देश का स्वाधीनता आन्दोलन भी अग्रपुत्र राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जी के नेतृत्व में ही लड़ा गया था। गांधी जी के साथ-साथ इस आन्दोलन में लाला लाजपत राय, सेठ हरदयाल जी, सेठ जमना दास बजाज, सेठ घनश्याम दास बिड़ला, सेठ चन्द्र भानु गुप्त व सेठ भगवानदास आदि हजारों अग्रबन्धुओं ने अपना सर्वस्व बलिदान कर दिया था। महाराणा प्रताप हल्दीघाटी का युद्व 18 जून, 1576 ई. को हार चुके थे और परिवार के साथ जंगलों में निर्वाह कर रहे थे। तब भामाशाह जी ने अपनी समस्त संपत्ति महाराणा प्रताप के चरणों में अॢपत कर दी थी। इस सहयोग से महाराणा प्रताप ने पुन: सैन्य शक्ति संगठित कर मुगल शासकों को पराजित कर फिर से मेवाड़ का राज्य प्राप्त किया। आज अग्रवाल समाज को यदि महाराजा अग्रसेन के मंत्र ने समर्थ बनाया है तो उन्हें उन भाइयों को भी उपर उठाने में सहयोग देना चाहिए जो आर्थिक विसंगतियों का दंश झेल रहे हैं। —अनिल गुप्ता तरावड़ी—

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