यूरोप के 7वें  देश ने भी बुर्का पर लगाया सख्त बैन; कानून तोड़ने पर लगेगा मोटा जुर्माना, छिड़ गया विवाद

Edited By Updated: 02 Jan, 2025 06:27 PM

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स्विट्ज़रलैंड ने 1 जनवरी 2025 से सार्वजनिक स्थानों पर बुर्का, हिजाब, या किसी भी तरीके से चेहरा पूरी तरह ढकने पर प्रतिबंध लागू कर दिया है। इस नए कानून के तहत नियम तोड़ने ...

International Desk: स्विट्ज़रलैंड ने 1 जनवरी 2025 से सार्वजनिक स्थानों पर बुर्का, हिजाब, या किसी भी तरीके से चेहरा पूरी तरह ढकने पर प्रतिबंध लागू कर दिया है। इस नए कानून के तहत नियम तोड़ने वालों पर 1000 स्विस फ्रैंक (करीब ₹96,000) तक का जुर्माना लगाया जाएगा। इस कानून के लागू होने के साथ ही स्विट्ज़रलैंड ऐसा कानून बनाने वाला यूरोप का सातवां देश बन गया है। इससे पहले फ्रांस, बेल्जियम, ऑस्ट्रिया, डेनमार्क, बुल्गारिया, और नीदरलैंड ने भी इसी तरह के कानून लागू किए हैं। 


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कैसे बना यह कानून?  
2021 में हुए जनमत संग्रह में 51.21% स्विस नागरिकों ने बुर्के पर बैन के पक्ष में वोट दिया था। हालांकि यह फैसला नजदीकी था और स्विट्ज़रलैंड की 26 में से केवल 15 कांतों (राज्यों) ने इसे मंजूरी दी थी।  2022 में स्विट्ज़रलैंड की संसद के निचले सदन, राष्ट्रीय परिषद, में इस कानून को पेश किया गया। यहां इसे 151 वोट के भारी बहुमत से पारित किया गया। हालांकि, कुछ पार्टियों और नागरिक संगठनों ने इसका कड़ा विरोध किया था।   कानून को 2023 में अंतिम मंजूरी मिली, और इसे 1 जनवरी 2025 से लागू कर दिया गया। 

 
कहां लागू होगा यह बैन? 
यह कानून सार्वजनिक स्थानों पर महिलाओं के चेहरा ढकने पर रोक लगाता है। इनमें  सरकारी कार्यालय और सार्वजनिक सेवाओं की जगह, पब्लिक ट्रांसपोर्ट  बस, ट्रेन, और अन्य सार्वजनिक परिवहन,  रेस्तरां और दुकानें,  किसी भी वाणिज्यिक या निजी स्थान व खुले सार्वजनिक स्थान जैसे पार्क, मॉल, और रोड शामिल हैे।  

 

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 इन स्थानों पर मिलेगी छूट 
- धार्मिक स्थान जैसे मस्जिद, चर्च, गुरुद्वारा।  
- मेडिकल कारणों से चेहरा ढकने वाले लोग।  
- सुरक्षा हेलमेट जैसे विशेष परिस्थितियां।  
  
 
इस कानून को लेकर दो वर्गों में बहस छिड़ गई है। इसका समर्थन करने वालों का कहना है कि यह सांस्कृतिक मूल्यों  और सार्वजनिक सुरक्षा  को बनाए रखने के लिए जरूरी है। उनका मानना है कि चेहरे को ढकना महिलाओं के अधिकारों के खिलाफ है और यह यूरोप की खुली संस्कृति से मेल नहीं खाता। जबकि आलोचकों का कहना है कि यह कानून धार्मिक स्वतंत्रता का उल्लंघन करता है और मुस्लिम महिलाओं को सीधे तौर पर निशाना बनाता है। ग्रीन पार्टी और सेंट्रल पार्टी जैसे राजनीतिक दलों ने इसे भेदभावपूर्ण बताया है। मुस्लिम बहुल देशों ने इसे धार्मिक स्वतंत्रता पर हमला बताया है। कुछ अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों ने भी इस कानून की निंदा की है।  

 

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