Edited By Mehak,Updated: 30 Jan, 2026 01:55 PM

बजट 2026 से पहले टैक्सपेयर्स और निवेशकों की नजरें वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण पर टिकी हैं। खासतौर पर कैपिटल गेंस टैक्स और सिक्योरिटीज ट्रांजेक्शन टैक्स (एसटीटी) को लेकर उम्मीदें बढ़ी हैं। पिछले वर्षों में टैक्स नियम बदलते रहे हैं और निवेशकों पर...
नेशनल डेस्क : बजट 2026 को लेकर उलटी गिनती शुरू हो चुकी है और एक बार फिर देश के करोड़ों टैक्सपेयर्स और निवेशकों की नजरें वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण पर टिकी हैं। बढ़ती महंगाई और बदलते आर्थिक माहौल के बीच आम लोगों को उम्मीद है कि इस बार सरकार टैक्स के मोर्चे पर कुछ राहत दे सकती है। खासतौर पर कैपिटल गेंस टैक्स (Capital Gains Tax) को लेकर बाजार और निवेशकों में सबसे ज्यादा चर्चा है।
पिछले कुछ वर्षों में कैपिटल गेंस टैक्स के नियमों में कई बार बदलाव हुए हैं, जिससे निवेशकों के लिए इन्हें समझना मुश्किल हो गया है। पहले एक समय ऐसा भी था जब लॉन्ग टर्म कैपिटल गेंस पर इंडेक्सेशन के साथ 20 प्रतिशत टैक्स लगता था। इंडेक्सेशन का फायदा यह था कि महंगाई के हिसाब से खरीद कीमत समायोजित हो जाती थी और टैक्स का बोझ कम पड़ता था।
2004 में सरकार ने सिक्योरिटीज ट्रांजेक्शन टैक्स यानी एसटीटी लागू किया और इसके बदले शेयरों व इक्विटी म्यूचुअल फंड्स पर लॉन्ग टर्म कैपिटल गेंस टैक्स से छूट दे दी गई। यह दौर निवेशकों के लिए काफी फायदेमंद रहा। लेकिन यह राहत ज्यादा समय तक नहीं टिक सकी। साल 2018 में सरकार ने फिर से एलटीसीजी टैक्स लागू कर दिया और एक लाख रुपये से ज्यादा के मुनाफे पर 10 प्रतिशत टैक्स तय किया गया। इससे निवेशकों पर एसटीटी और एलटीसीजी दोनों का बोझ आ गया।
इसके बाद 2024 के बजट में कैपिटल गेंस से जुड़े नियमों में फिर बड़ा बदलाव हुआ। शेयरों और इक्विटी म्यूचुअल फंड्स पर टैक्स दर बढ़ाकर 12.5 प्रतिशत कर दी गई। वहीं, प्रॉपर्टी पर टैक्स रेट घटाकर 12.5 प्रतिशत किया गया, लेकिन इंडेक्सेशन का फायदा खत्म कर दिया गया। विरोध के बाद सरकार ने 23 जुलाई 2024 से पहले खरीदी गई संपत्तियों के लिए पुराने नियम चुनने का विकल्प दिया।
सरकार का कहना है कि वह टैक्स सिस्टम को सरल बनाना चाहती है, लेकिन हकीकत यह है कि अभी भी अलग-अलग एसेट्स के लिए अलग नियम और होल्डिंग पीरियड हैं। इससे आम निवेशक भ्रमित हो जाता है। इसी वजह से बजट 2026 से उम्मीद की जा रही है कि सरकार एसटीटी को हटाने या कम करने पर विचार कर सकती है, ताकि दोहरे टैक्स का बोझ कम हो। साथ ही, होल्डिंग पीरियड को एक जैसा करने की मांग भी जोर पकड़ रही है।
डेट म्यूचुअल फंड निवेशकों के लिए भी यह बजट अहम माना जा रहा है। फिलहाल डेट फंड्स पर टैक्स स्लैब के हिसाब से लगता है, जिससे कंजरवेटिव निवेशकों को नुकसान होता है। उम्मीद है कि इस बार सरकार नियमों में बदलाव कर मध्यम वर्ग और छोटे निवेशकों को राहत देने की कोशिश करेगी।