Edited By Pardeep,Updated: 27 Jan, 2026 01:04 AM
देश की उच्च शिक्षा व्यवस्था से जुड़ा एक नया नियम इन दिनों सियासत, समाज और सोशल मीडिया—तीनों जगह चर्चा और विवाद का बड़ा कारण बन गया है।
नेशनल डेस्कः देश की उच्च शिक्षा व्यवस्था से जुड़ा एक नया नियम इन दिनों सियासत, समाज और सोशल मीडिया—तीनों जगह चर्चा और विवाद का बड़ा कारण बन गया है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा लागू किए गए ‘उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने के नियम, 2026’ को लेकर जहां एक तरफ इसे सामाजिक न्याय की दिशा में ऐतिहासिक कदम बताया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर देश के कई हिस्सों में इसका कड़ा विरोध भी शुरू हो गया है।
खास तौर पर अगड़ी जातियों से जुड़े संगठन, कुछ धार्मिक और सामाजिक नेता इस नियम पर सवाल उठा रहे हैं। यूपी विधानसभा चुनाव 2027 से पहले यह मुद्दा अब राजनीतिक रंग भी लेने लगा है।
UGC क्या है और उसका नया रेगुलेशन क्या है?
UGC (University Grants Commission) देश में उच्च शिक्षा से जुड़ी सबसे अहम संस्था है।
इसकी जिम्मेदारी है:
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विश्वविद्यालयों और कॉलेजों की गुणवत्ता तय करना
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उन्हें मान्यता और फंडिंग देना
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छात्रों और शिक्षकों के लिए समान अवसर सुनिश्चित करना
इसी UGC ने 15 जनवरी 2026 से देशभर के सभी विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में ‘उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने के नियम, 2026’ लागू कर दिए हैं। UGC का कहना है कि इस नियम का उद्देश्य- कैंपस में जातिगत भेदभाव रोकना, सभी वर्गों के छात्रों, शिक्षकों और कर्मचारियों को सुरक्षित, समान और सम्मानजनक माहौल देना।
नए कानून में क्या बड़ा बदलाव किया गया है?
अब तक उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव की शिकायतें, मुख्य रूप से SC (अनुसूचित जाति) और ST (अनुसूचित जनजाति) तक सीमित मानी जाती थीं। नए नियम में OBC (अन्य पिछड़ा वर्ग) को भी साफ तौर पर इस दायरे में शामिल कर लिया गया है।
इसका मतलब अब OBC छात्र, शिक्षक और कर्मचारी भी अपने साथ हुए किसी भी तरह के भेदभाव, उत्पीड़न या अपमान की आधिकारिक शिकायत दर्ज करा सकेंगे।
हर कॉलेज और यूनिवर्सिटी में क्या करना होगा अनिवार्य?
नए नियमों के तहत:
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हर विश्वविद्यालय और कॉलेज में SC, ST और OBC के लिए ‘समान अवसर प्रकोष्ठ’ बनाना जरूरी होगा।
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यूनिवर्सिटी स्तर पर एक Equality Committee (समानता समिति) बनाई जाएगी।
इस समिति में अनिवार्य रूप से शामिल होंगे:
यह समिति हर 6 महीने में रिपोर्ट तैयार करेगी। रिपोर्ट UGC को भेजी जाएगी। UGC का दावा है कि इससे शिकायतों की निगरानी बेहतर होगी,संस्थानों की जवाबदेही बढ़ेगी और पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता आएगी।
अगड़ी जातियों से जुड़े संगठन विरोध क्यों कर रहे हैं?
नियम लागू होते ही देश के कई हिस्सों में अगड़ी जातियों से जुड़े संगठनों में असंतोष देखने को मिला। विरोध करने वालों का आरोप है कि इस कानून का दुरुपयोग हो सकता है। झूठी शिकायतों के जरिए अगड़ी जातियों के छात्र और शिक्षक
फंसाए जा सकते हैं। जयपुर में करणी सेना, ब्राह्मण महासभा, कायस्थ महासभा, वैश्य संगठन ने मिलकर ‘सवर्ण समाज समन्वय समिति (S-4)’ बनाई है, ताकि इस नियम के खिलाफ संगठित आंदोलन किया जा सके।
उत्तर प्रदेश में मामला क्यों ज्यादा गरमाया?
उत्तर प्रदेश में यह मुद्दा सबसे ज्यादा चर्चा में है। गाजियाबाद डासना पीठ के पीठाधीश्वर यति नरसिंहानंद गिरि ने खुले तौर पर UGC नियमों का विरोध शुरू कर दिया। वे दिल्ली के जंतर-मंतर पर अनशन के लिए जा रहे थे लेकिन गाजियाबाद में ही
पुलिस ने उन्हें रोककर नजरबंद कर दिया। इसके बाद उन्होंने योगी सरकार पर सवर्ण समाज की आवाज दबाने का आरोप लगाया, जिससे विवाद और ज्यादा बढ़ गया।
सोशल मीडिया पर क्यों छिड़ी है जंग?
इस नियम को लेकर सोशल मीडिया पर वीडियो, पोस्ट और लाइव बहसों की बाढ़ आ गई है। अगड़ी जातियों से जुड़े कई यूट्यूबर, सोशल मीडिया इंफ्लुएंसर और एक्टिविस्ट इसे “सवर्ण विरोधी कानून” बता रहे हैं। स्वामी आनंद स्वरूप के एक वीडियो में सवर्ण समाज से एकजुट होने की अपील के बाद बहस और तेज हो गई।
वहीं दूसरी ओर सामाजिक न्याय समर्थक, छात्र संगठन और एक्टिविस्ट इसे बराबरी, सम्मान और भेदभाव खत्म करने की दिशा में जरूरी कदम बता रहे हैं।
UGC के आंकड़े क्या कहते हैं?
UGC ने संसद और सुप्रीम कोर्ट में जो आंकड़े पेश किए हैं, उनके मुताबिक पिछले 5 सालों में जातिगत भेदभाव की शिकायतों में 118.4% की बढ़ोतरी हुई है।
आंकड़े बताते हैं:
देशभर के 704 विश्वविद्यालयों, 1553 कॉलेजों से कुल 1160 शिकायतें सामने आईं। UGC इन आंकड़ों को नए नियम के पक्ष में सबसे मजबूत तर्क के तौर पर पेश कर रहा है।
सवर्ण वर्चस्व बनाम सामाजिक न्याय की बहस
आलोचकों का कहना है कि यह कानून सवर्ण समाज को निशाना बनाता है। समर्थकों का तर्क है कि उच्च शिक्षा संस्थानों में वंचित वर्गों की भागीदारी अब भी 15% से कम है। SC-ST अत्याचार निवारण कानून को लागू हुए 36 साल हो चुके हैं, फिर भी भेदभाव खत्म नहीं हुआ। इसी वजह से वे UGC के इस कदम को जरूरी और समयानुकूल सुधार मानते हैं।
आगे क्या असर पड़ेगा?
UGC का यह नया रेगुलेशन अब सिर्फ शिक्षा से जुड़ा मामला नहीं रहा बल्कि सामाजिक और राजनीतिक बहस बन चुका है। यूपी चुनाव 2027 से पहले यह मुद्दा और ज्यादा तेज हो सकता है। आने वाले महीनों में इसका असर कैंपस, सड़क और चुनावी राजनीति तीनों जगह साफ तौर पर दिखाई दे सकता है।